योगफल-
अरुण कमल ने मौजूदा परिप्रेक्ष्य में इस संग्रह में कई रचनाएँ रची हैं। उन्होंने देश और राजनीति पर खुलकर बात की है। वे रंग-बिरंगी कविताओं को अपनी खूबसूरत कूची से आकार देते हैं। कई बार भावुकता में खुद को समेट कर नया रंग उत्पन्न करते हैं। अरुण जी ने गहरे संदेश दिए हैं जो इस कविता-संग्रह को ख़ास बनाते हैं।
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अन्तिम सन्दूक लिए
आखरी ढोर डांगर लिए
एक पाँव में चप्पल डाले
नंगे पाँव खाली देह लिए
ये कौन हैं, कौन लोग, ये कौन?
कहाँ जा रहे हैं इतने पाँव-
बंगलुरु से मुम्बई बागडोगरा
दिल्ली अनन्तनाग अबूझमाड़ दरभंगा से
अपने ही घर अपनी ही रसोई से-
ये किस देश किस वतन के लोग हैं?
कहाँ है इनका राष्ट्र इनकी भूमि?
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हम जो चाहते थे सारी दुनिया को घर बनाना
आज अपना चूल्हा उठाये
भाग रहे यहाँ से वहाँ-
कहाँ हो मेरी माँ मेरी मातृभूमि?
नंगे पाँव खाली देह लिए
ये कौन हैं, कौन लोग, ये कौन?
कहाँ जा रहे हैं इतने पाँव-
बंगलुरु से मुम्बई बागडोगरा
दिल्ली अनन्तनाग अबूझमाड़ दरभंगा से
अपने ही घर अपनी ही रसोई से-
ये किस देश किस वतन के लोग हैं?
कहाँ है इनका राष्ट्र इनकी भूमि?
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हम जो चाहते थे सारी दुनिया को घर बनाना
आज अपना चूल्हा उठाये
भाग रहे यहाँ से वहाँ-
कहाँ हो मेरी माँ मेरी मातृभूमि?
उन्हीं की लिखी हुई है किताब योगफल उपलब्ध हैं


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